सोशल मीडिया का जाल बना जानलेवा! स्क्रीन के पीछे छिपा खतरा, परिवारों के लिए खतरे की घंटी

Edited By Kalash,Updated: 16 Feb, 2026 05:53 PM

social media become deadly

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों द्वारा की गई सामूहिक आत्महत्या की हृदयविदारक घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है।

बरनाला (विवेक सिंधवानी, रवि): उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों द्वारा की गई सामूहिक आत्महत्या की हृदयविदारक घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। इस घटना के बाद बरनाला के प्रमुख शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और सोशल मीडिया के घातक प्रभावों पर एक गंभीर चर्चा की। शिक्षाविदों वरुण भारती, संत रणपरीत सिंह गंडासिंहवाला, रविंद्रजीत सिंह बिंदी पक्खो, सुशील गोयल, राकेश गुप्ता तथा प्रमोद अरोड़ा ने संयुक्त रूप से अभिभावकों से अपील की है कि वे अपने अल्पायु बच्चों को सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से दूर रखें ताकि उन्हें ऐसी किसी मानसिक त्रासदी से बचाया जा सके।

सोशल मीडिया की लत: एक अदृश्य खतरा 

शिक्षाविद् वरुण भारती ने कहा कि गाजियाबाद की घटना ने यह साबित कर दिया है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि कच्ची उम्र के बच्चों के लिए एक मानसिक जाल बनता जा रहा है। उन्होंने कहा, "बच्चे सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली चमक-धमक और नकली जीवनशैली की तुलना अपने वास्तविक जीवन से करने लगते हैं, जो अंततः अवसाद और हीन भावना का कारण बनता है।"

वहीं, संत रणपरीत सिंह गंडासिंहवाला ने नैतिक मूल्यों पर जोर देते हुए कहा कि आज का बचपन स्क्रीन के पीछे खो गया है। बच्चों में धैर्य की कमी और अकेलेपन की भावना बढ़ रही है। उन्होंने सुझाव दिया कि परिवारों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए ताकि वे अपनी परेशानियां साझा कर सकें।

वैश्विक कड़े कानूनों की आवश्यकता 

चर्चा के दौरान रविंद्रजीत सिंह बिंदी पक्खो ने ऑस्ट्रेलिया और स्पेन जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में भी 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग तेज होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक सरकार कड़े नियम नहीं बनाएगी, तब तक तकनीकी कंपनियां मुनाफे के लिए बच्चों के भविष्य से खेलती रहेंगी।

सुशील गोयल ने तकनीकी पक्ष पर बात करते हुए बताया कि साइबर बुलिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी ने बच्चों के सुरक्षित वातावरण को खत्म कर दिया है। उन्होंने कहा, "अभिभावकों को तकनीक के प्रति जागरूक होना होगा। केवल फोन छीन लेना समाधान नहीं है, बल्कि उन्हें डिजिटल साक्षरता देना अनिवार्य है।"

मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार में बदलाव 

शिक्षाविद् राकेश गुप्ता ने शोधों का हवाला देते हुए बताया कि सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने से बच्चों में नींद की कमी, आत्मविश्वास का गिरना और पढ़ाई के प्रति अरुचि बढ़ रही है। गाजियाबाद की बहनों द्वारा उठाया गया आत्मघाती कदम इसी बढ़ते मानसिक दबाव का परिणाम है।

प्रमोद अरोड़ा ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि सरकार, अभिभावक और तकनीकी कंपनियों के त्रिकोणीय सहयोग से ही एक सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है। उन्होंने बरनाला के स्थानीय स्कूलों और संस्थाओं से अपील की कि वे बच्चों के लिए 'डिजिटल डिटॉक्स' सत्र आयोजित करें।

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