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राणा गुरजीत सिंह के इस्तीफे का मामला: बेटे को ED के समन के कारण गई पंजाब के दूसरे मंत्री की कुर्सी

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Monday, January 22, 2018-9:26 AM

लुधियाना(हितेश): राणा गुरजीत सिंह के इस्तीफे के बाद बेटे को ई.डी. के समन जारी होने के कारण पंजाब में किसी कैबिनेट मंत्री की कुर्सी जाने की लिस्ट में दूसरा मामला जुड़ गया है। इससे पहले अकाली सरकार के समय सरवन सिंह फिल्लौर को भी ई.डी. के सम्मन कारण इस्तीफा देना पड़ा था। जहां तक राणा गुरजीत सिंह के इस्तीफे का सवाल है उसे लेकर वैसे तो यह चर्चा ही चल रही है कि रेत खदान की बोली में नाम आने को लेकर आम आदमी पार्टी के नेता सुखपाल खैहरा द्वारा लगाए जा रहे आरोप भारी पड़ गए हैं।

लेकिन इस मामले की जांच के लिए गठित किए गए कमीशन ने तो राणा गुरजीत सिंह ने क्लीन चिट दे दी थी, उसके बावजूद इस्तीफा लेने को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कैप्टन अमरेंद्र सिंह 2 बार साफ  कर चुके हैं कि राणा का इस्तीफा रेत मामले की जगह किसी दूसरे केस में लिया गया है। अब अगर दूसरे मामले की बात करें तो वो ई.डी. द्वारा राणा गुरजीत सिंह को जारी किए गए सम्मन का है।इससे साफ  हो गया है कि रेत खदान बोली के मामले में जारी क्लीन चिट को झुठलाने के लिए खैहरा द्वारा पेश किए गए सबूतों को लेकर अपनी किरकिरी होने से कांग्रेस सरकार बचना चाहती है। इसके लिए ई.डी. के समन को आधार बनाया जा रहा है। हालांकि असलियत यह है कि दोनों ही मामलों को लेकर राहुल गांधी द्वारा दबाव बनाने के चलते कैप्टन को न चाहते हुए भी अपने करीबी राणा गुरजीत सिंह का इस्तीफा लेना पड़ा है।जो भी हो इस घटनाक्रम ने पंजाब के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा मामला जोड़ दिया है जिसमें दूसरी बार किसी मंत्री को अपने बेटे को ई.डी. द्वारा जारी समन के चलते इस्तीफा देना पड़ा है। इससे पहले अकाली दल की सरकार में जेल मंत्री रहे सरवन सिंह फिल्लौर की पहले कुर्सी चली गई और फिर कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद ई.डी. केस का मुद्दा बनने के कारण उनको टिकट भी नहीं मिल पाई थी। 

मजीठिया को छोड़कर 3 नेताओं का सियासी करियर हुआ तबाह 
ई.डी. का समन जारी होने का सियासी करियर पर असर पडऩे को लेकर अगर राणा गुरजीत सिंह व सरवन सिंह फिल्लौर के अलावा एक और नाम अविनाश चंद्र का भी आता है जो अकाली दल की तरफ  से पहले करतारपुर व फिर फिल्लौर से विधायक जीतने के बाद संसदीय सचिव बने हुए थे। लेकिन ई.डी. के नोटिस ने उनकी कुर्सी छीन ली थी। इतना जरूर है कि ड्रग रैकेट मामले में नोटिस जारी होने के बाद पूछताछ के लिए बुलाए जाने के बावजूद विक्रम सिंह मजीठिया पर अकाली दल ने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की थी।

 हाईकोर्ट में चल रहे केस की सुनवाई से पहले इस्तीफा लेने की भी चर्चा 
राणा गुरजीत सिंह के नाम के साथ एक और विवाद बिजली मंत्री होने के कारण भी जुड़ा हुआ था। इसमें उनकी शुगर मिल होने के कारण बिजली की खरीद फरोख्त होने के कारण बिजली मंत्रालय देने को चुनौती दी गई थी। अब राणा गुरजीत सिंह द्वारा बिजली मंत्री के पद से इस्तीफा देने के अलावा शुगर मिल से हिस्सेदारी बेचने का जवाब देने पर कोर्ट ने केस खारिज कर दिया है। इसके बाद से चर्चा छिड़ गई है कि इस कोर्ट केस के मद्देनजर ही राणा से इस्तीफा लेने में जल्दबाजी दिखाई गई है क्योंकि अगर कोर्ट से कोई सख्त फैसला आता तो सरकार की ज्यादा किरकिरी होती। 

खैहरा पर भी बढ़ा नैतिकता दिखाने का दबाव 
राणा गुरजीत सिंह के इस्तीफे की बात आते ही सुखपाल खैहरा की भी चर्चा छिड़ गई है, क्योंकि रेत खदान की बोली में राणा की शमूलियत होने के बारे मीडिया में खुलासा होने के बाद खैहरा द्वारा लगातार इस मामले को उठाया जा रहा था।इसके तहत उन्होंने सिंचाई विभाग में हुए करोड़ों के घोटाले में नामजद ठेकेदार के राणा गुरजीत सिंह के साथ संबंध जोडऩे के लिए सबूत पेश किए। इस बारे में खैहरा द्वारा राहुल गांधी को लिखी चिट्ठी को भी राणा पर इस्तीफा देने का दबाव बनाने का आधार माना जा रहा है। हालांकि राणा गुरजीत सिंह सहित कांग्रेस द्वारा नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की बात कही जा रही है। इसके चलते खैहरा पर भी ड्रग माफिया के साथ संबंधों को लेकर कोर्ट द्वारा जारी नोटिस को लेकर नैतिकता के आधार पर नेता विपक्ष के पद से इस्तीफा देने का दबाव बढ़ रहा है। इसके जवाब में खैहरा द्वारा सुप्रीम कोर्ट में केस पैंङ्क्षडग होने की दलील दी जा रही है।

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