Edited By Kalash,Updated: 05 Oct, 2026 11:58 AM

स्वास्थ्य विभाग के फूड विंग द्वारा खाद्य वस्तुओं की जांच और सैंपल लेने को लेकर बड़े-बड़े आंकड़े जारी कर अपनी कार्यशैली दिखाने के बावजूद विभाग की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
अमृतसर (दलजीत): स्वास्थ्य विभाग के फूड विंग द्वारा खाद्य वस्तुओं की जांच और सैंपल लेने को लेकर बड़े-बड़े आंकड़े जारी कर अपनी कार्यशैली दिखाने के बावजूद विभाग की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। कुछ दिन पहले फूड विंग द्वारा मासिक कारगुजारी पर आंकड़े जारी करते हुए बताया गया था कि कितने सैंपल लिए गए, कितने मानकों पर खरे उतरे, कितने फेल हुए और कितने सैंपल अनसेफ पाए गए लेकिन इन आंकड़ों में वह जानकारी गायब रही जिससे आम उपभोक्ता सीधे तौर पर अवगत होना चाहता है कि किस संस्थान या दुकान के सैंपल फेल हुए, कौन-कौन से अनसेफ पाए गए और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि जिन मामलों में संबंधित खाद्य कारोबारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई या मामले विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं, उनका भी विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया। इस कारण विभाग द्वारा जारी किए गए आंकड़े अब केवल गिनती बताने तक ही सीमित नजर आ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार फूड सेफ्टी कमिश्नर द्वारा सरकारी पत्र जारी करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि एनफोर्समैंट अभियान के तहत लिए गए सैंपलों के परिणामों के साथ-साथ संबंधित फूड बिजनैस आप्रेटर्स की जानकारी आम जनता तक पहुंचाई जाए। इस जानकारी को इलैक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से नियमित रूप से प्रकाशित करवाने के निर्देश भी दिए गए हैं परंतु विभाग द्वारा हाल ही में जारी की गई मासिक कारगुजारी में आंकड़ों की लंबी सूची तो दिखाई गई लेकिन यह नहीं बताया गया कि फेल या अनसेफ सैंपल किस संस्थान से लिए गए थे।
फूड विंग द्वारा जारी आंकड़ों में महीने-दर-महीने की कारगुजारी का ब्योरा देना अपने आप में अच्छी बात है लेकिन असल सवाल इसके आगे शुरू होता है। यदि किसी माह में सैंपल फेल हुए हैं तो उपभोक्ता को यह भी पता होना चाहिए कि वह सैंपल कहां से लिया गया था। यदि कोई सैंपल अनसेफ पाया गया तो उस संस्थान के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? क्या उसे नोटिस दिया गया, चालान किया गया, लाइसैंस से संबंधित कार्रवाई हुई या मामला अदालत में भेजा गया? इसी तरह जो मामले पहले से ही विभिन्न अदालतों में पहुंच चुके हैं, उनकी स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। केवल यह बता देना कि इतने सैंपल फेल हुए और इतने अनसेफ आए, उपभोक्ताओं को पूरी तस्वीर नहीं देता।
केवल आंकड़ों तक जानकारी सीमित रखना सवालों के घेरे में
फूड सेफ्टी का मकसद सिर्फ सैंपलों की संख्या बढ़ाना या प्रैस बयान में आंकड़े जारी करना नहीं है। असल मकसद घटिया, मिलावटी और असुरक्षित भोजन बेचने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना और उपभोक्ताओं को जागरूक करना है। यदि विभाग फेल और अनसेफ सैंपलों वाले संस्थानों के नाम ही सार्वजनिक नहीं करता तो आम लोगों को यह कैसे पता चलेगा कि किस संस्थान से खाद्य सामग्री खरीदते समय सावधान रहना है? इसके अलावा जब खुद कमिश्नर द्वारा संबंधित खाद्य कारोबारियों की जानकारी मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक करने के आदेश दिए गए हैं तो स्थानीय स्तर पर केवल आंकड़ों तक जानकारी सीमित रखने का मकसद भी सवालों के घेरे में आ जाता है।
अब फूड विंग से जवाब मांगने की जरूरत
अब सवाल यह है कि कमिश्नर के आदेशों के बाद अमृतसर फूड विंग द्वारा कितने फेल और अनसेफ सैंपलों से संबंधित संस्थानों के नाम सार्वजनिक किए गए? कितने मामले अदालतों में पहुंचे और उनकी मौजूदा स्थिति क्या है? कितने कारोबारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई?
इन सभी सवालों का जवाब विभाग को देना चाहिए। सिर्फ आंकड़े जारी करके फूड सेफ्टी की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। जब कमिश्नर के आदेश ही फेल सैंपलों वाले खाद्य कारोबारियों की जानकारी सार्वजनिक करने के हैं, तो फिर अमृतसर में यह जानकारी छुपाने की नौबत क्यों आ रही है यही अब सबसे बड़ा सवाल है।
आखिरकार क्यों छुपाए गए संस्थानों के नाम?
आर.टी.आई. एक्टिविस्ट जय गोपाल लाली और रजिंदर शर्मा राजू ने कहा कि विभाग द्वारा जारी आदेशों में स्पष्ट किया गया है कि खराब कारगुजारी करने वाले संस्थानों के नाम भी सार्वजनिक किए जाएं लेकिन विभाग द्वारा आंकड़े तो पेश कर दिए गए, उन संस्थानों के नाम नहीं दिए गए। संस्थानों के नाम-पते जनता को भी पता होने चाहिएं कि किस संस्थान में खराब खाद्य पदार्थ मिल रहा है और किसमें अच्छा मिल रहा है परंतु आंकड़ों वाले लिखित पत्र जारी होने के बावजूद दुकानों के नामों से संबंधित जानकारी छुपाई गई। आखिरकार बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या विभाग की मिलीभगत के कारण इन संस्थानों के नामों को छुपाया गया है?
निर्देशों के बारे में जानकारी नहीं थी, जल्द संस्थानों के नाम भी करेंगे सार्वजनिक
जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर मनजीत सिंह रटौल से जब इस संबंध में बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि पत्र के बारे में उन्हें पहले जानकारी नहीं थी। जब उनसे पूछा गया कि क्या आपके निचले अधिकारियों ने भी नहीं बताया, तो उन्होंने कहा कि उनकी तरफ से भी पत्र के बारे में खुलासा नहीं किया गया था, जो आंकड़े जारी किए गए हैं, उनमें जल्द ही जिन संस्थानों का प्रदर्शन खराब रहा है, उनके नाम भी सार्वजनिक किए जाएंगे।
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