जालंधर नगर निगम FIR दर्ज करवाने में नाकाम! 100 डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों से करोड़ों की वसूली ठंडे बस्ते में

Edited By Urmila,Updated: 04 Oct, 2026 11:52 AM

case regarding the extortion of crores from colonizers

नगर निगम जालंधर की करोड़ों रुपए की बकाया राशि दबाकर बैठे करीब 100 के करीब कॉलोनाइजरों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करवाने के लिए पुलिस कमिश्नर को पत्र भेजे हुए 3 महीने का समय बीत चुका है।

जालंधर (खुराना): नगर निगम जालंधर की करोड़ों रुपए की बकाया राशि दबाकर बैठे करीब 100 के करीब कॉलोनाइजरों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करवाने के लिए पुलिस कमिश्नर को पत्र भेजे हुए 3 महीने का समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक इस मामले में पुलिस कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई है। इससे नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब निगम खुद डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों की सूची तैयार करके पुलिस को भेज चुका है तो फिर एफ.आई.आर. दर्ज करवाने में इतनी देरी क्यों हो रही है।

करीब तीन महीने पहले नगर निगम ने स्पष्ट किया था कि संबंधित कॉलोनाइजरों के खिलाफ बी.एन.एस. और पापरा एक्ट के तहत आपराधिक मामले दर्ज करवाए जाएंगे। साथ ही डिप्टी कमिश्नर को पत्र भेजकर इन कॉलोनाइजरों की मालिकी वाले खाली प्लॉटों की रजिस्ट्रियों तथा प्रॉपर्टी संबंधी लेन-देन पर रोक लगाने की सिफारिश भी की गई थी। लेकिन इतने समय बाद भी मामला कागजों से आगे नहीं बढ़ पाया।

सबसे अहम बात यह है कि मेयर वनीत धीर पिछले करीब एक डेढ साल से इन डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों से करोड़ों रुपये की वसूली करवाने के प्रयास कर रहे हैं। मेयर का लगातार यह कहना रहा है कि निगम की बकाया राशि हर हाल में वसूल की जानी चाहिए और इस पैसे को शहर के विकास कार्यों पर लगाया जा सकता है। इसके बावजूद बिल्डिंग विभाग के अधिकारियों की तरफ से बिल्कुल भी गंभीरता नहीं दिखाई गई।

बताया जा रहा है कि कई बार अधिकारियों को बकाया राशि की वसूली और डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी रही। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नगर निगम के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं हैं, विकास कार्यों के लिए पैसों की जरूरत है और दूसरी तरफ करोड़ों रुपए की राशि पहले से ही निगम के खाते में आनी बाकी है तो उसकी वसूली को लेकर इतनी ढिलाई क्यों बरती जा रही है।

निगम की अपनी कार्रवाई के अनुसार वर्ष 2013 और 2018 में अवैध कॉलोनियों को रेगुलर करने के लिए सरकार की ओर से पालिसी लाई गई थीं। बड़ी संख्या में कॉलोनाइजरों ने कॉलोनियों को रैगुलर करवाने के लिए आवेदन किए, लेकिन निर्धारित विकास शुल्क और अन्य देय राशि पूरी तरह जमा नहीं करवाई गई। यही रकम अब लंबे समय से निगम की बकाया सूची में चली आ रही है।

अब सवाल यह भी है कि पुलिस को भेजे गए पत्र का क्या हुआ और डिप्टी कमिश्नर को भेजी गई रजिस्ट्री रोकने की सिफारिश पर क्या कार्रवाई हुई। यदि निगम वास्तव में करोड़ों रुपए की वसूली को लेकर गंभीर है तो तीन महीने में कम से कम एफ.आई.आर. और संपत्ति संबंधी कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए थी।

शहर में विकास कार्यों के लिए फंड की कमी का हवाला अक्सर दिया जाता है। ऐसे में निगम के अपने रिकॉर्ड में दर्ज करोड़ों रुपए की बकाया राशि की वसूली न होना न केवल आर्थिक नुकसान है बल्कि निगम की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना होगा कि निगम प्रशासन और बिल्डिंग विभाग इन डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों के खिलाफ कार्रवाई कब शुरू करता है और निगम को उसकी बकाया रकम कब मिलती है।

इन कॉलोनियों को काटने वालों पर कार्रवाई का इंतजार

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