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राज की बातः सिस्टम के उलट काम बर्दाश्त नहीं कर रहे थे सुरेश, इसलिए बने निशाना

  • राज की बातः सिस्टम के उलट काम बर्दाश्त नहीं कर रहे थे सुरेश, इसलिए बने निशाना
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Sunday, January 21, 2018-10:27 AM

जालंधर(राकेश बहल, सोमनाथ कैंथ): सुरेश कुमार प्रकरण में केवल 3 ही नहीं कुछ और किरदार शामिल हैं। इस प्रकरण की पटकथा चंडीगढ़ के एक सरकारी क्लब में बैठ कर लिखी गई थी। जिसे लिखते समय इसके किस पात्र को क्या करना है यह तय कर लिया गया था।

इसकी थीम थी-मिशन कैप्टन अमरेन्द्र सिंह और निशाना थे सुरेश कुमार। इस कहानी को लिखने वाले पंजाब सरकार के पुराने शातिर नौकरशाहों ने पहले से यह तय कर लिया था कि किसी भी तरह इसका अंत दुखद होना चाहिए इसलिए पूरी तैयारी के साथ इस कहानी को तैयार किया गया। सूत्रों का कहना है कि सरकार बनते ही 10 साल से सत्ता सुख भोग रहे कुछ अफसरों ने कैप्टन सरकार को फ्लॉप करवाने के मंसूबे तैयार करने शुरू कर दिए थे। सरकार 16 मार्च को बनी थी।

 

सरकार के शपथ ग्रहण करते ही सबसे बड़ी चुनौती फसल की खरीद करना था।  ‘आप’ को सत्ता तो नहीं मिली लेकिन अब इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। इसलिए पहले दिन से हमलावर हो गई। इस लॉबी में अफसरों के साथ-साथ कुछ विधायक भी शामिल हैं। इनका एकमात्र मकसद अपना हस्तक्षेप बढ़ाकर सरकार को फेल करना है, जो सुरेश कुमार के होते नहीं हो रहा था। 

 

सूत्रों का कहना है कि इस कहानी के पात्रों में 3 पुलिस अफसर शामिल हैं। ये तीनों सी.एम. के काफी नजदीकी हैं। एक हर पल उनके साथ रहता है।इनमें से 2 कभी सी.एम. के खास सलाहकार रहे हैं। सुरेश कुमार की इन तीनों से नहीं पट रही थी। इसलिए ये तीनों भी इस खेल में शामिल हो गए। इन्होंने काफी समय पॉवर से बाहर रहे एक अन्य पुलिस अफसर को भी अपने साथ मिला लिया। इस अफसर ने ही इस कहानी का अंत क्या होगा, तय किया। 
 

एक नौकरशाह जो एक बड़े पद का दावेदार था, को सुरेश कुमार ने बड़ा पद नहीं लेने दिया था। वह भी इस टीम में शामिल हो गया। ये सभी पात्र अपना-अपना काम कर रहे थे। इनका मुख्य काम सुरेश कुमार के खिलाफ माहौल बनाना था। इनको पता था कि वे किसी विवादों में नही पड़ना चाहते। इसलिए पटीशन दायर होते ही सब अपने काम में लग गए। इस कहानी का अंत तय करने में सी.एम. के खास कानून के एक माहिर ने अहम भूमिका अदा की है। उसका सुरेश कुमार के साथ काफी समय से पंगा चल रहा था।
 

सुरेश कुमार चाहते थे कि सब काम सिस्टम से हों। इसलिए कई बार उक्त व्यक्ति को रोका भी और कहा कि सिस्टम में हस्तक्षेप नहीं चलेगा। इससे शुरू हो गई पॉवर सैंटरों की लड़ाई। इस पॉवरफुल किरदार को भी बदला लेने का मौका मिल गया। इसने अपना काम कर दिया। पटीशन दायर होने के बाद जब सुरेश कुमार ने अपना इस्तीफा दिया था तब उन्होंने सी.एम. के समक्ष इसका नाम भी लिया था। सूत्रों का कहना है कि सी.एम. का बेहद खास रहा सलाहकार, अंदर खाते इस खेल में शामिल हुआ है।

 

 एक कारण यह भी हो सकता है
कांग्रेस के एक सीनियर विधायक का कहना है कि सुरेश कुमार के कारण ही सिंचाई विभाग में चल रहा बड़ा घोटाला सामने आया था। कई और मामलों की जांच वह करवा रहे थे, यह भी एक कारण है कि भ्रष्ट लॉबी उनको किसी तरह भी रास्ते से हटाना चाहती थी इसलिए यह लॉबी पटीशन दायर होने के बाद माहौल बना रही थी। इस विधायक ने दावा किया कि कांग्रेस के 77 विधायकों में से कम से कम 70 विधायक सुरेश कुमार के हक में सी.एम. को लिख देने का मन बना रहे हैं।

 

सुरेश कुमार के रहते कैप्टन के खिलाफ  काम कर रही अफसरशाही हो रही थी फेल
सरकार बनते की कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती गेहूं की खरीद करना था। 10 साल सत्ता में रहे अकाली दल के कुछ खास अफसर सरकार को फेल करने की रणनीति तैयार कर रहे थे। आम आदमी पार्टी भी फसल की खरीद को लेकर राज्यपाल से मिलने पहुंच गई लेकिन सुरेश कुमार की रणनीति के सामने सब फेल हो गए। केन्द्र में भाजपा सरकार होने के बावजूद सुरेश कुमार ने कैश क्रैडिट लिमिट बनवा दी।किसानों को परेशानी भी नहीं आई और मंडियों से फसल लिफ्ट भी हो गई। इसके बाद आंगनबाड़ी कर्मचारियों ने हड़ताल की थी, उसको भी तुरंत सुरेश कुमार ने हल किया। ऐसे कई मौके 10 महीनों में आए जब सरकार कुशल प्रशासन के बल पर बाहर निकली है।

 

यह मामला जितना सीधा दिखाई दे रहा, उतना है नहीं
इस प्रकरण के तार कई अफसरों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। अफसरशाही कई गुटों में विभाजित है। ये गुट हिन्दू अलग, दलित और जाट गुट अलग से हैं। हमेशा से किसी न किसी गुट का प्रशासन और पुलिस पर कब्जा रहा है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था जब न तो पुलिस में कई एक गुट हावी हो रहा था और न ही सिविल प्रशासन में। ऐसे में इन गुटों को चलाने वाले अफसरों को सुरेश कुमार से परेशानी हो रही थी।

 

पुलिस तबादले तो नहीं इस लड़ार्ई की जड़
गृह विभाग सी.एम. के पास है। सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ समय से इन तबादलों में राजनीतिक दखल कम हो गया था। केवल डी.एस.पी. स्तर पर नेताओं की बात मानी जा रही थी वे भी रिकार्ड देख कर। ऐसे में काफी समय पुलिस पर काबिज रहे कुछ अफसर परेशान हो गए थे। वे भी इसके पीछे हो सकते हैं।

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