सुखबीर बादल के ड्रीम प्रोजैक्ट पर केंद्र सरकार ने चलाया डंडा

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Sunday, July 16, 2017-12:24 PM

चंडीगढ़: पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के ड्रीम प्रोजैक्ट पर केंद्र सरकार ने ‘डंडा’ चला दिया है। रणजीत सागर डैम के इर्द-गिर्द अंतर्राष्ट्रीय टूरिज्म स्थल बनाए जाने को लेकर तैयार किए गए प्रोजैक्ट को मंजूरी के लिए पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भेजा गया था।

मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय ने जांच के बाद इंस्पैक्शन रिपोर्ट में कहा कि योजना महज दिखावा मात्र ईको टूरिज्म प्रोजैक्ट है जबकि असल में बड़े निर्माण कार्य प्रस्तावित किए गए हैं। यह सीधे डैम के कैचमैंट एरिया और ईको-सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। ऐसी सूरत में योजना मौजूदा रूप में फॉरैस्ट कंजर्वेशन एक्ट के तहत स्वीकार योग्य नहीं है।

रिपोर्ट में कहा गया कि शिवालिक धौलाधार टूरिज्म डिवैल्पमैंट बोर्ड ने योजना के लिए 123.68 हैक्टेयर वन भूमि को डायवर्ट करने की मांग की है। बोर्ड की तरफ से भेजे गए मूल प्रस्ताव में बताया गया था कि योजना के कुल क्षेत्र में 57.72 हैक्टेयर एरिया अन-डीमार्केटेड प्रोटैक्टेड फॉरैस्ट है और 65.96 हैक्टेयर एरिया पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट, 1900 के तहत क्लोज्ड है। इसके उलट, पंजाब सरकार के नोडल ऑफिसर ने अपने पत्र में लिखा है कि 83.59 हैक्टेयर एरिया अन-डीमार्केटेड प्रोटैक्टेड फॉरैस्ट है और 39.87 हैक्टेयर एरिया पंजाब लैंड प्रीजर्वेशन एक्ट, 1900 के तहत क्लोज्ड है। इस तरह मूल प्रस्ताव और नोडल ऑफिसर के भेजे पत्र में 0.25 हैक्टेयर जमीन का अंतर है जिसकी स्थिति पंजाब सरकार स्पष्ट नहीं कर पाई है।

बोर्ड को भंग कर पी.आई.डी.बी. को सौंपा था प्रोजैक्ट
खास बात यह है कि जिस शिवालिक धौलाधार टूरिज्म डिवैल्पमेंट बोर्ड के बैनर तले योजना मंत्रालय के पास मंजूरी के लिए भेजी गई थी, उसे कैप्टन सरकार ने हाल ही में भंग कर दिया है। अब इस प्रस्तावित योजना की जिम्मेदारी पंजाब इंफ्रास्ट्रक्चर डिवैल्पमेंट बोर्ड (पी.आई.डी.बी.) को सौंपी गई है। ऐसे में अब मंत्रालय के नामंजूर करने से पी.आई.डी.बी. के लिए यह प्रोजैक्ट पूरा कर पाना मुश्किल हो गया है।  सरकार ने बोर्ड को भंग करने के दौरान कहा था कि यह सरकार पर बेवजह आर्थिक बोझ है। वहीं, पूर्व शिअद-भाजपा सरकार ने बोर्ड का गठन इस आधार पर किया था कि शिवालिक फुटहिल्स में टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं, जिसमें यह अहम रोल अदा करेगा।

कैचमैंट एरिया में खर्चे गए 4.4 करोड़
जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस कैचमैंट एरिया को डायवर्ट करने की बात कही जा रही है, वहां रणजीत सागर डैम बनने के दौरान जो 19.42 हैक्टेयर फॉरैस्ट डायवर्ट किया गया गया था, उससे प्राप्त 4.4 करोड़ रुपए की धनराशि से सॉयल कंजर्वेशन व एफॉरैस्टेशन किया गया है।

प्रस्तावित प्रोजैक्ट में वृक्ष कटाई का कोई ब्यौरा नहीं
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंस्पैक्शन में पाया गया कि प्रस्तावित जगह पर करीब 11010 पेड़ व 3541 बांस हैं। यह साफ नहीं किया गया कि कितने पेड़ों को काटा जाएगा। हालांकि यूजर एजैंसी ने कहा कि सभी वृक्ष संभवत: नहीं काटे जाएंगे लेकिन यह कॉर्पाेरेट एजैंसी के ले-आऊट प्लान पर निर्भर करेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रोजैक्ट रणजीत सागर डैम के कैचमैंट एरिया में है, इसलिए प्रस्तावित निर्माण से जलाशय में गाद की समस्या बढ़ सकती है।

यूजर एजैंसी ने मुहैया नहीं करवाया सी.बी.ए.
जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि यूजर एजैंसी ने योजना के संबंध में कॉस्ट बैनीफिट एनालिसिस (सी.बी.ए.) मुहैया नहीं करवाया है जबकि 1000 करोड़ के निवेश प्रस्ताव में यह सबसे अनिवार्य पक्ष है। कॉस्ट बैनीफिट एनालिसिस मोटे तौर पर प्रस्तावित योजना से जंगल व आसपास रहने वाले बाशिंदों को होने वाले नुक्सान को ध्यान में रखकर किया जाता है ताकि प्रस्तावित योजना से होने वाले लाभ-हानि का अंदाजा लगाया जा सके।

स्वीकार न करने के अहम कारण
*फॉरैस्ट कंजर्वेशन एक्ट की गाइडलाइंस पैरा 4.5 (द्ब) के अनुरूप न होने के कारण यह स्वीकार योग्य नहीं है।
*प्रस्तावित योजना डैम के कैचमैंट एरिया में स्थित है, जहां निर्माण कार्यों से जलाशय पर गाद की समस्या बढ़ सकती है, जो ईको सिस्टम को प्रभावित करेगी।
*पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट, 1900 के तहत क्लोज्ड जिस 39.87 हैक्टेयर भूमि को मांगा जा रहा है, वह भू-जल संरक्षण के लिहाज से अहम है, ऐसे में योजना को मंजूरी से संरक्षण पर विपरीत प्रभाव पड़ेंगे।
*यह प्रस्ताव पब्लिक यूटीलिटी प्रोजैक्ट नहीं है। अलबत्ता, ईको टूरिज्म के नाम पर बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजैक्ट प्रस्तावित किया गया है।
*प्रस्तावित योजना का कोई ले-आऊट प्लान नहीं है और न ही यह पता है कि कितने पेड़ काटे जाएंगे? 
*पंजाब की ईको टूरिज्म पॉलिसी के हिसाब से भी यह योजना न्यायसंगत नहीं है।
*प्रस्तावित योजना साइट स्पैसेफिक नहीं है क्योंकि यहां होने वाले निर्माण कार्यों का तभी पता चलेगा, जब पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में जगह बेची जाएगी।

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