कहां से आई...चिट्ठी गुमनाम, लंबे इंतजार के बाद अंजाम

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Thursday, August 24, 2017-1:55 AM

चंड़ीगढ़: एक गुमनाम चिट्ठी के कितने मायने हैं। यह डेरा मुखी पर लगे यौन शोषण के आरोपों से ही पता चलता है। जब यह चिट्ठी सामने आई तो कोई यकीन ही नहीं कर पा रहा था कि डेरा मुखी पर इस तरह के आरोप भी लग सकते हैं। 2002 में एक गुमनाम साध्वी ने एक गुमनाम चिट्ठी लिखी। वह कौन थी, कहां से आई, उसके साथ क्या हुआ था, किसी को नहीं पता। वह कहां रह रही है, वह आज भी गुमनाम है। बस कोर्ट की सुनवाई में दर्ज उसके बयान ही उसकी पहचान भर हैं। 

जब यह चिट्ठी सामने आई तो किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। वजह थी डेरे की प्रतिष्ठा, लेकिन मई 2002 में सिरसा के तत्कालीन सैशन जज को इस चिट्ठी की जांच सौंपी गई। इसमें आशंका जाहिर की गई कि कुछ तो गलत है जिसकी जांच होनी चाहिए। इसे लेकर हाईकोर्ट ने सी.बी.आई जांच के निर्देश दिए। सितंबर 2002 में हाईकोर्ट ने चिट्ठी में लगाए गए आरोपों की जांच सी.बी.आई. से कराने के निर्देश दिए। सी.बी.आई. ने केस लेते ही पहले इसकी जांच की। इसमें पाया गया कि जांच के लिए पर्याप्त तथ्य हैं। तब दिसंबर 2002 में सी.बी.आई. ने राम रहीम के खिलाफ 376, 506 व 509 में मामला दर्ज कर लिया। केस दर्ज होते ही डेरे की ओर से दिसम्बर 2003 से सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ अपील की गई। अक्तूबर 2004 तक मामले में स्टे लगा रहा। जैसे ही स्टे  हटा तो जांच में तेजी आई।

शुरूआत में किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था

सी.बी.आई . ने खोजा 
कई अधिकारियों से होते हुए सी.बी.आई. में यौन उत्पीडऩ की यह जांच सतीश डागर के पास पहुंची। उन्होंने सबसे पहले पीड़िता को खोजा। उसे विश्वास में लिया। केस के लिए पर्याप्त सबूत व तथ्य जुटाए गए। इसे आधार बना कर जुलाई 2007 में सी.बी.आर्ई. ने अंबाला सी.बी.आई. कोर्ट में चार्जशीट फाइल की क्योंकि सी.बी.आई. कोर्ट बाद में पंचकूला आ गई, इसलिए अब सुनवाई यहीं चल रही है। 

बाद में दो और पीड़ित सामने आए
इसी बीच दो और पीड़ित भी सामने आए। सी.बी.आई. का केस मजबूत होता चला गया। 2009 में दो पीड़ित सामने आए, जिन्होंने अदालत में बयान दिए। इससे सी.बी.आई. को अब आधार मिल गया, जिससे कोर्ट में केस टिक सकता था। 2011 से 2016 तक ट्रायल चला। हालांकि डेरे की ओर से भी मजबूत पैरवी हुई। इसके बाद भी एक गुमनाम चिट्ठी की जांच करते- करते सी.बी.आई. के पास अब इतना कुछ था कि जांच टीम कोर्ट में मजबूती से अपनी बात रख सकती थी। हालांकि बचाव पक्ष ने खूब दलील दी। सी.बी.आई. ने धीरे-धीरे केस को बढ़ाते हुए अंजाम तक पहुंचाया। 

2016 तक 52 गवाह किए गए पेश
सी.बी.आई. के सामने सबसे बड़ी दिक्कत थी कि गवाह को कैसे मजबूत रखा जाए। क्योंकि यही डर बना रहता था कि एक बार बयान देने के बाद गवाह कहीं बाद में मुकर ही न जाए। यही बात थी, जिससे सी.बी.आई. की जांच टीम खासी परेशान थी। फिर भी इस मामले में जुलाई 2016 तक 52 अलग-अलग गवाहों ने अपना बयान दिया। 15 प्रॉसीक्यूशन व 37 डिफैंस के गवाह इस लिस्ट में शामिल थे। 

...और शुरू हुई हर रोज सुनवाई
यह मामला काफी समय ले रहा थ। ऐसे में 25 जुलाई 2017 को कोर्ट ने रोज सुनवाई करने के निर्देश दिए ताकि केस जल्द निपट सके। 17 अगस्त 2017 को बहस खत्म हुई और 25 अगस्त को फैसला आना है। इस पर सबकी नजर टिकी हुई है। सी.बी.आई. का कहना है कि यह केस अपनी तरह का अलग ही केस था। इसे अंजाम तक पहुंंचाना बहुत मुश्किल काम था, लेकिन जैैसे ही जांच शुरू हुई तो कई सारेे तथ्य सामने  आ गए जिससे मुश्किल आसान होती चली गई।

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