2019 के लिए नए सियासी समीकरण साधने में जुटी भाजपा

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Tuesday, November 14, 2017-9:10 AM

जालंधर (पाहवा): अगले लोकसभा चुनाव में सिर्फ 18 महीने बचे हैं। लिहाजा राजनीतिक पाॢटयों के लिए कुछ पुराने और बोझ बन चुके गठबंधनों को छोड़कर नया फायदेमंद चुनावी गठजोड़ करने की कवायद शुरू करने का समय आ गया है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डी.एम.के. चीफ एम. करुणानिधि से इसी हफ्ते हुई मुलाकात को अहमियत दी जा रही है। मौजूदा स्थिति में भाजपा उद्धव ठाकरे और शरद पवार को भी अलग नजर से देख रही है। 


इस बात की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं कि अगर शिवसेना महाराष्ट्र के सत्ताधारी भगवा गठबंधन से बाहर निकलती है, तो क्या शरद पवार की एन.सी.पी. इसमें घुस सकती है? कई लोगों का मानना है कि टी.डी.पी. चीफ और आंध्र प्रदेश के सी.एम. एन. चंद्र्रबाबू नायडू को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या उनकी सहयोगी भाजपा और उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे जगनमोहन रैड्डी की पार्टी वाई.एस.आर. कांग्रेस के बीच भी ऐसा हो सकता है क्योंकि लोकसभा चुनाव में टी.डी.पी. को सरकार विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है। उधर नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बी.जे.डी. और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में भी राजनीतिक उठापटक देखने को मिल सकती है।बिहार में महागठबंधन की जीत के बाद भाजपा द्वारा नीतीश कुमार के साथ जाने को भगवा ऑप्रेशन की केस स्टडी के तौर पर देखा जा रहा है। इस तरह भाजपा 2019 के लिए नए सियासी समीकरण साधने में जुटी हुई है।

10 राज्यों में नुक्सान पर नजर
कुछ जानकारों का मानना है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी पाॢटयों को एकजुट करे या न करे, भाजपा उससे पहले रिजनल री-इंजीनियरिंग की कोशिशों में जुट गई है ताकि तकरीबन 10 राज्यों में पार्टी अपनी सीटों में संभावित गिरावट को रोक सके। मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने 41 (भाजपा 23-शिवसेना 18) सीटें जीती थीं। राज्य में लोकसभा की कुल 48 सीटें हैं। भाजपा ने यू.पी. में 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल की। मध्य प्रदेश में 29 में से 26 सीटें, गुजरात की सभी 26, राजस्थान की सभी 25, झारखंड की 14 में से 12, छत्तीसगढ़ की 11 में से 10, दिल्ली की सभी 7, हरियाणा की 10 में से 7, उत्तराखंड की सभी 5, हिमाचल की सभी 4 और गोवा की दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी। इनमें से ज्यादातर सीटें भाजपा के शासन वाले राज्यों में हैं जिसके कारण सरकारों के खिलाफ बन सकने वाले रुझान के कारण भाजपा के लिए अगले लोकसभा चुनाव में इस तरह की सफलता बरकरार रखना मुश्किल है। ऐसे में रणनीतिक जरूरत के मुताबिक वैकल्पिक राज्यों की तरफ देखना जरूरी है। इसमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में संभावित राज्य हैं। 

तमिलनाडु पर निशाना 
मोदी-करुणानिधि बैठक को बेशक सामान्य मुलाकात कहा जा रहा है लेकिन कई लोग इसका राजनीतिक मतलब निकाल रहे हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में गठबंधन राजनीति के आगमन के बाद से डी.एम.के. और ए.आई.ए.डी.एम.के. दिल्ली दरबार में भाजपा और कांग्रेस के साथ समय-समय पर गठबंधन करती रही हैं। कई जानकार मोदी की करुणानिधि से मुलाकात में शुरूआती संकेत ढूंढ रहे हैं। उनके मुताबिक भाजपा ऐसे वक्त में डी.एम.के. नेतृत्व के साथ रिश्ते बना रही है, जब जयललिता की मौत के बाद गुटबाजी की शिकार और नेतृत्व विहीन ए.आई.ए.डी.एम.के. राजनीतिक पतन के दौर से गुजर रही है। फिल्म स्टार कमल हासन भी तमिलनाडु की राजनीतिक पिच पर दाव आजमाने की तैयारी में हैं, लिहाजा भाजपा को लग रहा है कि तमिलनाडु में डी.एम.के. ही एकमात्र मैराथन खिलाड़ी है, जबकि ए.आई.ए.डी.एम.के. अंदरूनी कलह और सरकार विरोधी लहर की शिकार है। बताया जाता है कि मोदी ने एन.सी.पी. के मुखिया शरद पवार की बेटी को केंद्र सरकार में मंत्री पद भी ऑफर किया था। एक तरह भाजपा-शिवसेना के रिश्ते खराब हो रहे हैं, वहीं एन.सी.पी. दिल्ली और मुम्बई, दोनों जगह पर सत्ता में नहीं है और उसे इस बात की बेचैनी है।

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