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महानगर के वकीलों ने माना न्यायपालिका के लिए ये खतरे की घंटी

  • महानगर के वकीलों ने माना न्यायपालिका के लिए ये खतरे की घंटी
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Saturday, January 13, 2018-9:31 AM

जालंधर (रविंदर शर्मा, अमित कुमार): भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट के जजों का एक खास मुद्दे को लेकर प्रैस के सामने आने से न्यायपालिका व्यवस्था में हड़कंप मच गया है। भारतीय न्यायपालिका को देश के लोकतंत्र का एक मजबूत स्तंभ माना जाता है। मगर जिस तरह से आंतरिक मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने अपने ही चीफ जस्टिस पर सवाल खड़े किए हैं उससे पूरी न्यायपालिका व्यवस्था खुद कटघरे में आ गई है।

पूरे मामले को लेकर चीफ जस्टिस पर आरोप लगाने वाले चारों जजों की कार्य व्यवस्था पर एक तरफ जहां सवाल खड़े हो रहे हैं, वहीं इन जजों की ओर से उठाए गए मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है।महानगर  के वकीलों का मानना है कि जजों का मीडिया के सामने आकर इस तरह व्यवस्था पर सवाल खड़े करने से न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है और ऐसा लगने लगा है कि जैसे अब देश की न्यायपालिक व्यवस्था भी राजनीतिक प्लेटफार्म बनकर रह गई है। पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए देश के प्रधानमंत्री ने न्यायपालिका के इस मुद्दे पर सरकार द्वारा दखल देने से जहां इंकार किया है, वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने जजों द्वारा उठाए मुद्दों पर उनका पक्ष लेते हुए जांच की बात कही है। आइए जानते हैं डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के वरिष्ठ वकीलों ने इस पूरे मुद्दे पर जो कुछ कहा।

 

इस तरह से सीनियर जजों को अपने निजी विवाद को पब्लिक में नहीं लाना चाहिए था। इससे आम आदमी की नजर में न्यायपालिका के सम्मान को ठेस पहुंचती है। अगर किसी जज का किसी अन्य के साथ कोई मनमुटाव है तो आपस में बैठकर उसको निपटाने का प्रयास होना चाहिए। आज जो घटना घटी वह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहला बार हुई है और यह बेहद दुखदायक है। अगर जजों के आरोप सही हैं तो उसमें एक सोचने वाली बात है कि वे अपने सीनियर के खिलाफ शिकायत कहां लेकर जाएं, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया में इस बात का कोई प्रावधान ही नहीं है। किसी जज को निकालने के लिए महाभियोग लाना पड़ता है और यह तब तक संभव नहीं है, जब तक केन्द्र और राज्य के सब राजनेता उसके खिलाफ हों। इस बात का प्रयास किया जाना चाहिए कि अगर यह शिकायत ठीक है तो उसका समाधान कैसे किया जाना चाहिए।     -एडवोकेट मनदीप सचदेव  

जजों के इस तरह से मीडिया में जाने से पूरी न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है। अगर किसी जज को किसी बात को लेकर ऐतराज है तो उसे रखने के लिए न्यायिक प्रक्रिया में कई और रास्ते भी उपलब्ध हैं। मगर सीधा मीडिया में अपनी बात रखना उचित नहीं है। मगर इस बात से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि न्यायपालिका लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और अगर इसमें कोई सुधार की आवश्यकता है तो मामला कॉलेजियम में ही उठाना चाहिए था। यह बेहद दुखद है कि जजों को अपनी बात रखने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ा।     -एडवोकेट के.के. अरोड़ा 

आज का दिन देश की जनता के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। यह एक अवांछित कदम जरूर है, मगर बेहद गंभीर भी है। इसे बेहद धैर्य के साथ डील करते हुए सिस्टम के भविष्य के हितों पर भी विचार करना अनिवार्य है। मुझे उम्मीद है कि यह एक राजनीतिक मुद्दा बनकर नहीं रह जाएगा और इसका सही हल निकल आएगा।   -एडवोकेट जोहेब 
                                           

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