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उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों का संदेश

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Monday, December 04, 2017-3:33 AM

उ.प्र. के नगर निकायों के चुनावों के नतीजे आ गए हैं। लोकतंत्र की यह विशेषता है कि नेता को हर 5 साल में मतदाता की परीक्षा में खरा उतरना होता है। ऐसा कम ही होता है कि एक व्यक्ति लगातार 2 या उससे ज्यादा बार उसी क्षेत्र से चुनाव जीते। 

अगर ऐसा होता है, तो स्पष्ट है कि उस व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में काम किया है और उसकी लोकप्रियता बनी हुई है। अलबत्ता, अगर कोई माफिया हो और वह अपने बाहुबल के जोर से चुनाव जीतता हो, तो दूसरी बात है। उ.प्र. के अधिकतर महापौर भाजपा के टिकट पर जीते हैं। इसके दो कारण हैं। एक तो केन्द्र और राज्य में भाजपा की सरकार होने के नाते मतदाता को यह उम्मीद है कि अगर जिले से केन्द्र तक एक ही दल की सत्ता होगी तो विकास कार्य तेजी से होंगे और साधनों की कमी नहीं आएगी। दूसरा कारण यह है कि योगी सरकार को बने अभी 7 महीने ही हुए हैं। उ.प्र. के मतदाताओं को अपेक्षा है कि सरकार व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन करेगी, इसलिए उसको इतना भारी समर्थन मिला है।

पर, साथ ही जिन सीटों पर कार्यकत्र्ताओं की छवि और क्षमता को दरकिनार कर किन्हीं अन्य कारणों से सिफारिशी उम्मीदवारों को टिकट मिले, वहां उनकी पराजय हुई है। यह चुनावी गणित का एक पेचीदा सवाल होता। दल के नेता का लक्ष्य होता है कि किसी भी तरह से चुनाव जीता जाए। इसीलिए अक्सर ऐसे उम्मीदवारों को भी टिकट दे दिए जाते हैं, जिन्हें बाहरी या ऊपर से थोपा हुआ मानकर कार्यकत्र्ता गुपचुप असहयोग करते हैं। जबकि, इन्हें टिकट इस उम्मीद में दिया जाता है कि वे जीत सुनिश्चित करेंगे। नैतिकता का तकाजा है कि जिसने दल का सामान्य कार्यकत्र्ता बनकर लंबे समय तक समाज और दल के हित में कार्य किया हो, जिसकी छवि साफ हो और जिसमें नेतृत्व की क्षमता हो, उसे ही टिकट दिया जाए। पर, अक्सर ऐसा नहीं होता और इससे कार्यकत्र्ताओं में हताशा फैलती है और वे बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े होकर कड़ी चुनौती देते हैं। जो भी हो, अब तो चुनाव हो गए। हर दल अपने तरीके से परिणामों की समीक्षा करेगा। 

सवाल यह है कि स्थानीय निकायों की प्रमुख भूमिका क्या है और क्या जीते हुए उम्मीदवार अब जन आकांक्षाओं को पूरा करने में जी-जान से जुटेंगे? देखने में तो ये आता है कि चुनाव जीतने के बाद ज्यादातर उम्मीदरवार उन कामों में ही रुचि लेते हैं, जिनमें उन्हें ठेकेदारों से अच्छा कमीशन मिल सके। चूंकि स्थानीय निकायों का काम सड़क, नाली, खड़ंजे, पार्क, रोशनी आदि की व्यवस्था करना होता है और इन मदों में आजकल केन्द्र सरकार अच्छी आर्थिक मदद दे रही है, इसलिए छोटे-छोटे ठेकेदारों के लिए काफी काम निकलते रहते हैं। पर इस कमीशनखोरी की वजह से इन कार्यों की गुणवत्ता संदेहास्पद रहती है। 

इसीलिए उ.प्र. के ज्यादातर नगरों में आप सार्वजनिक सुविधाओं को भारी दुर्दशा में पाएंगे। टूटी-फूटी सड़कें, अवरुद्ध और उफनती नालियां, बिजली के खम्भों से लटकते तार, हर जगह कूड़े के अम्बार और गंदे पानी के पोखर उ.प्र. के नगरों के चेहरों पर बदनुमा दाग की तरह हर ओर दिखाई देते हैं। फिर वह चाहे प्रदेश की राजधानी लखनऊ हो या प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र बनारस या तीर्थराज प्रयाग हो या राम और कृष्ण की भूमि-अयोध्या व मथुरा। हर ओर आपको इन नगरों की ऐसी दयनीय दशा दिखाई देगी कि आप यहां आसानी से दोबारा आने की हिम्मत न करें। नगरों की साफ -सफाई के लिए एक कुशल गृहिणी की मानसिकता चाहिए। एक ही घर की दो बहुएं अपने-अपने कमरों को अलग-अलग तरह से रखती हैं। एक का कमरा आपको 24 घंटे सजा-संवरा दिखेगा, जबकि दूसरी के कमरे में जहां-तहां कपड़े और सामान बिखरा मिलेगा। 

ठीक इसी तरह जिस वार्ड का प्रतिनिधि अपने वार्ड की साफ-सफाई और रखरखाव को लेकर लगातार सक्रिय रहेगा, उसका वार्ड हमेशा चमकता रहेगा। जो निन्यानवें के फेर में रहेगा, उसका वार्ड दयनीय हालत में पड़ा रहेगा। अब ये जिम्मेदारी मतदाताओं की भी है कि वे अपने पार्षद पर कड़ी निगाह रखें और उसे वह सब करने के लिए मजबूर करें, जिसके लिए उन्होंने वोट दिया था। एक समस्या और आती है, वह है विकास के धन का दुरुपयोग। चूंकि अनुदान मिल गया है और पैसा खर्च करना है, चाहे उसकी जरूरत हो या न हो, तो ऐसे-ऐसे काम करवाए जाते हैं, जिनमें सीधे जनता के धन की बर्बादी होती है। इसलिए मैंने हाल ही की अपनी दो बैठकों में मुख्यमंत्री योगी जी से साफ  कहा कि महाराज, एक तो काम करवाने में भ्रष्टाचार होता ही है और दूसरा, योजना बनाने में उससे भी बड़ा भ्रष्टाचार होता है। 

उदाहरण के तौर पर, आपके वार्ड की सड़क अच्छी-खासी है। अचानक एक दिन आप देखते हैं कि उस कंक्रीट की सड़क को ड्रिल मशीन से काट-काटकर उखाड़ा जा रहा है। फिर कुछ दिन बाद वहां रेत बिछाकर इंटरलॉकिंग टाइल्स लगवाए जा रहे हैं जिनको लगवाने का उद्देश्य केवल अनुदान को ठिकाने लगाना होता है। लगने के कुछ ही दिनों बाद ये टाइल्स जगह-जगह से उखडऩे लगते हैं। फिर कभी कोई उन्हें ठीक करने या उनका रखरखाव करने नहीं आता। इस तरह एक अच्छी-खासी सड़क बदरंग हो जाती है। मतदाता तो अपनी रोजी-रोटी में मशगूल हो जाता है और प्रतिनिधि पैसे बनाने में। अगर उ.प्र. के नगरों की हालत को सुधारना है तो इन जीते हुए प्रतिनिधियों, महापौरों और योगी सरकार को कमर कसनी होगी कि कुछ ऐसा करके दिखाएं कि संसदीय चुनाव से पहले उ.प्र. के नगर बिना फिजूलखर्ची के दुल्हन की तरह सजे दिखें। हां, इस काम में नागरिकों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी तभी इन चुनावों की उपलब्धि सार्थक हो पाएगी।-विनीत नारायण

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